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छत्तीसगढ़ की दुकानों के लिए बिल और उधार

गाँव की किराना दुकान से बस्तर के हाट के ठेले तक, बिल और उधार कॉपी से निकलकर आपके फ़ोन में आ जाते हैं।

बस्तर के साप्ताहिक हाट में रंगीन साड़ियों में दो औरतें उकड़ूँ बैठी हैं, एक के हाथ में बोतल और दूसरी के हाथ में पत्ता
बस्तर के साप्ताहिक हाट में रंगीन साड़ियों में दो औरतें उकड़ूँ बैठी हैं, एक के हाथ में बोतल और दूसरी के हाथ में पत्ता फ़ोटो: Inside me Journey, CC BY-SA 4.0

छत्तीसगढ़ के काउंटर पर गिनती कहाँ छूटती है: हाट का दिन, इस्पात का शहर और पोला की शाम

  1. इस्पात शहर का काउंटर और जंगल के गाँव का काउंटर, दो अलग दुकानें हैं

    इस्पात कारख़ाने के पास के ग्राहकों को हर महीने तय तारीख़ को तनख़्वाह मिलती है, और कैंटीन या हॉस्टल को अपने राशन का पक्का बिल चाहिए। जंगल के किनारे के परिवारों के पैसे आने की कोई तय तारीख़ नहीं होती, वे नमक और तेल ज़रूरत पर ले जाते हैं, और काग़ज़ बिल्कुल नहीं माँगते। आप दोनों के लिए एक ही कॉपी रखते हैं, और वह किसी के काम नहीं आती।

  2. पोला के बैलों के लिए घंटियाँ, रंग और झूल, आख़िरी दो घंटों में माँगे गए

    पोला की शाम परिवार अपने बैल सजाने आते हैं: गले के लिए घंटियाँ, सींगों के लिए रंग, पीठ के लिए झूल। वे देर से आते हैं, सब एक साथ, और जो बचा हो वही ले जाते हैं। क्या रखना चाहिए था, यह तब पता चलता है जब शेल्फ़ ख़ाली हो चुकी होती है, और अगले साल वही ग़लती दोहराई जाती है।

  3. ठेला भरकर हाट जाता है और लौटता है एक ऐसे आँकड़े के साथ जिस पर कोई यक़ीन नहीं करता

    जंगल के गाँव का हाट उठता है तो इमली की टोकरियाँ और नमक-तेल के पैकेट ठेले पर लदकर जाते हैं, और लौटकर एक कपड़े का थैला नक़द और कुछ न बिकी बोरियाँ आती हैं। क्या गया यह एक कॉपी में है, क्या लौटा दूसरी में, और बीच का फ़र्क़ किसी ने नहीं निकाला। इसलिए हाट की मेहनत वसूल हुई या नहीं, यह बस एक एहसास है, और घर में उस पर बहस भी एहसास की ही।

हरेली का चित्र: हरे खेत में गेंदे की झालरों के नीचे हल, कुदाल, हँसिया और बाँस की दो गेड़ी
हरेली का चित्र: हरे खेत में गेंदे की झालरों के नीचे हल, कुदाल, हँसिया और बाँस की दो गेड़ी

इमली की टोकरी और कैंटीन के जीएसटी बिल से पोला की शाम तक

  • जंगल के परिवार की इमली की टोकरी, उसके नाम के साथ दर्ज

    मौसम में जंगल की तरफ़ के परिवार दुकान को बेचने के लिए इमली की टोकरियाँ लाते हैं। हर परिवार का एक पन्ना सप्लायर के तौर पर बनाइए, और उस पर हर टोकरी का वज़न और दिन लिखिए। परिवार अगले हफ़्ते लौटे, तो आप देख सकते हैं कि पिछली बार वह क्या लाया था, और वज़न की बात रिकॉर्ड से शुरू होती है।

  • मिल की कैंटीन के लिए जीएसटी बिल, उसी मिनट काउंटर पर बना

    इस्पात शहर की कैंटीन गाँव की दुकान से राशन ले सकती है और फिर भी पक्का बिल चाहती है। बिल उसी मिनट रसोइये के फ़ोन पर पहुँचता है, काउंटर पर आम बिलों के बीच बना, इसलिए गाँव की दुकान अब वो दुकान नहीं रही जो कहती है कि अगले हफ़्ते आना।

  • पोला की शाम, शाम ढले हाथ में गिनती के साथ

    पोला की शाम गली देर तक भरी रहती है, और परिवार घंटियों, रंगों और झूल के लिए एक साथ आते हैं। हर चीज़ चुनते ही उस पर उँगली रखिए, और अगला परिवार काउंटर तक पहुँचे उससे पहले बिल स्क्रीन पर होता है, इसलिए क़तार चलती रहती है और शाम की कमाई लंबे इंतज़ार में नहीं खोती।

पोला का चित्र: पहियों पर दो खिलौना बैल, चटक झूलें, फूलों की मालाएँ और लाल सिरों वाले सींग
पोला का चित्र: पहियों पर दो खिलौना बैल, चटक झूलें, फूलों की मालाएँ और लाल सिरों वाले सींग

हाट के दिन, धान के मौसम और कोसा की शादियों में छत्तीसगढ़ की दुकान के काम की चीज़ें

  • फ़ोन पर बिल

    इमली की टोकरी पर तराज़ू एक हाथ में पकड़े और दूसरे अँगूठे से टाइप किया गया बिल, ताकि हाट के दिन ख़रीदार अंदाज़े के बजाय कुल जोड़ लेकर जाए।

  • GST बिल

    कैंटीन का हफ़्ते भर का राशन जीएसटी बिल में लिखा हुआ, हर लाइन पर टैक्स निकला हुआ।

  • रोज़ की रिपोर्ट

    हाट का ठेला घर क्या लाया, नक़द और न बिकी बोरियाँ, एक ही सूची में साथ-साथ पढ़े हुए।

  • कम स्टॉक की चेतावनी

    नमक, तेल और साबुन, यानी हाट के दिन सबसे पहले ख़त्म होने वाला माल, जब कुछ पैकेट बचे हों तभी निशान लग जाए, ताकि अगले हाट का सामान सूची से लादा जाए।

  • सप्लायर को ऑर्डर

    इमली बेचने वाले हर जंगल के परिवार का एक पन्ना, जिसमें हर टोकरी का वज़न और दिन उसके आने पर लिख लिया जाता है।

धमतरी के जंगल से तोड़ी गई इमली की फलियों से भरी बेंत की गोल टोकरी
धमतरी के जंगल से तोड़ी गई इमली की फलियों से भरी बेंत की गोल टोकरी फ़ोटो: Krishna.p, CC BY-SA 4.0

चाँपा में कोसा, भिलाई में इस्पात, कोरबा में कोयला: ज़िले-ज़िले छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ के ज़िले बिल्कुल अलग-अलग काम से जीते हैं। यहाँ पाँच हैं, और हर एक किस कारोबार के लिए जाना जाता है।

  • कोरबा को छत्तीसगढ़ की बिजली की राजधानी, ऊर्जा नगरी, कहा जाता है। कुछ अनुमानों के मुताबिक़ उसकी जीडीपी का 60 प्रतिशत से ज़्यादा कोयला खनन और उससे जुड़े काम से आता है।
  • रायगढ़ में जिंदल स्टील का प्रमुख एकीकृत इस्पात कॉम्प्लेक्स है, जिसकी इस्पात बनाने की क्षमता साल में 36 लाख टन है और जिसकी अपनी कोयला खदान है।
  • बलौदाबाज़ार ज़िले में चूना पत्थर कई सीमेंट कारख़ानों को चलाता है, और भाटापारा मंडी साल भर फ़सल की ख़रीद-बिक्री के लिए मशहूर है।
  • महासमुंद की ज़मीन में चूना पत्थर और ग्रेनाइट मिलता है, और कई छोटे उद्योग चूना पत्थर का इस्तेमाल करते हैं।
  • जांजगीर-चाँपा का चाँपा शहर ज़री के किनारे वाली सबसे बारीक कोसा रेशमी साड़ियों के लिए जाना जाता है, जिनकी शादियों के लिए पूरे देश में माँग रहती है। यहाँ के बुनकर हज़ारों में हैं।

शुरू करने से पहले छत्तीसगढ़ के दुकानदार क्या पूछते हैं

क्या इस्पात शहर की कैंटीन और जंगल के एक परिवार के पन्ने एक ही फ़ोन पर रह सकते हैं?

हाँ। दोनों का अपना पन्ना है। कैंटीन के हफ़्ते भर के बिल उसके नाम के नीचे और जंगल के परिवार के छोटे बिल उसके नाम के नीचे जमा होते हैं, इसलिए एक का हिसाब दूसरे के पन्ने में नहीं पढ़ा जाता।

हरेली या पोला, किसने मेरा ज़्यादा माल हिलाया, और हाट का दिन बाक़ी छह सुस्त दिनों के सामने कितना बड़ा है?

हाँ। रोज़ की रिपोर्ट में हरेली और पोला के हफ़्ते अगल-बगल खोलिए: जिसने आपके काउंटर पर ज़्यादा लोग भेजे, वही बताता है कि अगले साल खेती के औज़ार ज़्यादा रखने हैं या बैलों की सजावट। फिर हाट के दिन को उसके बाद के छह दिनों के सामने रखिए, तो पता चलता है कि अगले हाट के लिए कितना ले जाना है।

मैं चाँपा के बुनकर परिवारों से कोसा साड़ियाँ लेता हूँ। हर परिवार की सप्लाई अलग रख सकता हूँ?

हाँ। साड़ी के नाम में परिवार का नाम जोड़ दीजिए, तो हर परिवार के कोसा के नग की अपनी गिनती रहती है और आप देखते हैं कि किस परिवार का बुना माल बचा है।

हर दुकान के और सवाल

छत्तीसगढ़ की दुकानों के पीछे इस्पात के शहर और कोसा के करघे

छोटे इस्पात बनाने वाले रायपुर की रीढ़ हैं। अक्टूबर 2026 तक उरला और सिलतरा के औद्योगिक इलाक़ों में रोलिंग मिलें, इस्पात गलाने की दुकानें और लोहा बनाने की इकाइयाँ हैं। रोलिंग मिल गर्म इस्पात को छड़ों और चादरों में ढालती है, और गलाने की दुकान कबाड़ और सिल्लियों को नए इस्पात में बदलती है।

दुर्ग ज़िले के भिलाई को मध्य भारत का इस्पात शहर कहा जाता है। उसकी अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से भिलाई स्टील प्लांट पर और उसके आसपास उग आई छोटी इकाइयों पर टिकी है।

कोरबा और जांजगीर-चाँपा के साथ बिलासपुर उन तीन ज़िलों में है जो जीआई-प्रमाणित कोसा रेशम बुनते हैं। जीआई का निशान इस बात का प्रमाणपत्र है कि वह कपड़ा उसी जगह का है जहाँ वह बनता है।